मैं थक गया हूँ, सबको अहसास कराते-कराते,
किसकी क्या अहमियत है ये उनको बताते-बताते।।
हर किसी को आज बस दीखवी जज़्बात चाहिए,
टूट रहे है रिश्ते सभी आज हकीकत समझाते-समझाते।।
मैं जैसा बाहर हूँ ठीक वैसा ही अंदर भी हूँ,
नहीं बदलता खुद को जमाने को दिखाते - दिखाते।।
शायद नही हूँ मैं वैसा जैसा सब बनाना चाहते है,
दूर निकल रहा है हर कोई मेरे करीब आते-आते।।
हर किसी को अब बस मेरी लिखावटों में आना है,
ऊब गए है सब मुझसे अब शायद मिलते-मिलाते।।
हर कोई बनावटी होता जा रहा है इस दुनिया में,
मैं थक गया हूँ अब महफिलों में मुस्कुराते-मुस्कुराते।।
तू क्या था क्या है मेरे खातिर अब नही बता सकता,
मैं हार गया हूँ तुझे ये यकीन अब दिलाते-दिलाते।।
आ सकता है तो एक नज़र तू भी देख ले हाल मेरा,
मेरी आवाज़ें बंद हो रही है तेरा नाम चिल्लाते-चिल्लाते।।
मैं लिख भी दूँगा तुझे "चौहान" कलम से अपनी,
अश्क़ ना रुकेंगे तेरे फिर खुद को पढ़ते-पढ़ाते।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wah... 👌👌👌👌
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