किस बात का जश्न किस बात की खुशी,
इस राह पे मैं अपनो का गुनहगार हो गया।।
उठा फ़ायदा मेरी बेबसी का आज फिर,
ज़िंदगी इस साल भी मैं तेरा कर्ज़दार हो गया।।
वो कौन लोग थे जिनकी जान हुआ करते थे हम,
कहाँ है अब वो जिन्हें पाकर मैं ख़ुशगवार हो गया।।
ये कैसी ख़लिश है मुझमें जो मिटती ही नही,
क्या है जिसका मैं मंज़िल पर आके तलबदार हो गया।।
कठपुतली ही तो बना रखा है ज़िंदगी तूने ,
हाँ सच तेरी चोंट खाकर ये पत्थर एक आकार हो गया।।
खुद को खुद से मिला लेता हूँ शायरी के बहाने,
दुनिया कहती है "चौहान" गीतकार हो गया।।
वो जो बात बात पर मेरा अपना होने का दावा करते थे ,
कोई उन्हें भी इतल्लाह कर दो मैं बेकार हो गया।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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