किताब मेरी ज़िंदगी की,
लगी ना जाने कितने हाथ,
किसी ने देखा, छोड़ दिया,
किसी ने पढ़ ली कुछ बात,
कोई पढ़कर भूल गया मुझे,
कोई यादों में ले गया साथ,
किसी ने खुद से जोड़ कर,
समझे थे कभी मेरे हालात,
कितनो ने था खरीदा मुझे,
कितनो ने समझा था बेकार,
कहीं नाम मिला बेशुमार,
कही नासमझी की दुत्कार,
ये कितने तराज़ू तोल थे,
जहाँ तुलते रहे बार-बार,
वो कहते रहे यकीन है,
और आज़माते रहे हर बार,
वो पूरा पढ़ के ख़ामोश था हमें,
जान बैठा था वो हर राज़,
बस एक छुपा रखा था उससे,
"चौहान" मेरी कहानी का,
एक तू ही था हमराज़।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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