Friday, 13 March 2020

"दादा-पौता" (DADA - POTA)


मैंने बड़े करीब से देखा है उसे,
हालातों का सामना करते हुए,
मेरी खुशियों की खातिर लड़ते हुए,
मेरी एक मुस्कान की ख़ातिर,
ज़मी आसमाँ एक करते हुए,
हाँ उस वक़्त नादान था मैं,
अपने पराये के फर्क से अनजान था मैं,
पर बात एक भी भुला नही हूँ मैं,
वो काँधे पर बैठ कर घूमाना,
वो पाँव के झूले पर झूलाना,
वो पास बैठा कर पढ़ाना,
वो हर एक बात को समझाना,
वो पुरानी कहानी किस्से सुनना,
अब तलक भुला नही हूँ मैं,
वो मेरा स्कूल जाने से कतराना,
वो जिद्द करके बाल ना कटवाना,
वो तेरा मुझे साईकिल दिलवाना,
वो सुबह सवेरे घूम कर आना,
अब तलक भुला नही हूँ मैं,
प्यार परिवार तो अब भी है,
पर एक तेरी कमी नज़र आती है,
जहाँ बैठा करता था तूँ,
आज वो बैठक भी बंद नज़र आती है,
वो दीवार पर तस्वीर पर हार देख,
आज भी आँखे नम हो जाती है,
ज़रूरत बहुत है पर तुझसा अब सलाहकार नही है,
वक़्त से पहले समझा दे ऐसा तजुर्बेकार नही है,
मायने हर रिश्ते के अपने-अपने है "चौहान",
पर दादा-पौते वाला प्यार नही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

2 comments:

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...