इस अनजान शहर में कोई अपना भी नही,
आखिर किस से हम यहाँ मुलाक़ात करें।।
ना ज़ुबाँ मालूम है ना लहज़ा यहाँ के लोगो का,
आखिर कैसे हम किसी से यहाँ बात करें।।
एक अजब सी मायूसी देखी है आँखों मे यहाँ सबके,
आखिर कैसे हम इन को बयाँ अपने हालात करे।।
ये मुहोब्बत का कोई शहर था शायद किसी दौर में,
तभी यहाँ आज दिल सबके जलते श्मशान मिले।।
कैसे पूछता पतझड़ में गिरते पत्तो से उनका हाल,
मुझे तो खुद से खुद बात करते हुए कई बेज़ुबान मिले।।
लौट आया वापिस फिर अपने ही शहर में "चौहान",
मेरे दिल की बस्ती थी वो जिसके हर घर वीरान मिले।।
कैसे लिख दूँ अपने हाथों अपनी बर्बादी का फ़साना,
हम खुद गुनहगार है हमारे तुमसे क्या सवालात करे।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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