ये कैसा आवारापन है ,
की ये मिटता ही नही,
क्यूँ धुँवा-धुँवा है हर कहीं,
की ये छँटता ही नही,
ये कैसी मुहोब्बत है तुझसे,
तेरे अलावा कुछ दिखता ही नही,
तू मेरा तो नही है फिर क्यूँ,
नक्श तेरा दिल से मिटता नही,
कैसी तन्हाई है जान ले रही है,
अजब तमाशा है ज़िंदा हूँ पर ज़िंदा नही,
कितना समझाऊँ खुद को,
दिल मेरा दिलासे समझता नही,
ये कैसा ज़ख्म लगा है मुझको,
कोई मरहम काम करता ही नही,
हर दिन चलता रहता हूँ बेखबर,
ये कैसा रास्ता है कि कटता ही नही,
हर दर चौंखट पर झुका है ये सिर,
अब ये मंदिर मज़ारों पर झुकता नही,
ख़ामोशी घर कर गयी है मुझमे इस कदर,
अब खुद से भी मैं मिलता नही,
ये बारिश जला कर राख कर रही है मुझे,
काले बादलों का साया है कि हटता नही,
अब इस सफ़र में मुझको आराम चाहिए,
अब इन गलियों से मेरा कोई वास्ता नही,
ये रात आखिरी है जो लिख रहा हूँ,
अब मुझे हाल दिलों का लिखना ही नही,
ये तन्हाई अकेलापन ठीक है "चौहान",
शायरों की मंडी में अब मुझे बिकना नही।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Aye hye nice Bhai
ReplyDeleteThanks bro 😍😍
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