Friday, 28 September 2018

"कड़वा सच" (KADWA SACH)


वजूद अपना भूल सब खुद को परवरदिगार समझ बैठे है,
महज़ कठपुतली है वो जो खुद को कलाकार समझ बैठे है।।

नुक्स निकल देते है उसमे भी जो दुनिया तराश के बैठा है,
दूसरों की ज़िंदगी पर तो वो खुद को हक़दार समझ बैठे है।।

हर बात पर तर्क- वितर्क कर लेते है आज यहाँ बच्चे भी,
नादान है समझते है के सूरज को दीपक दिखाकर बैठे है।।

खुद की उलझनों से ही नही सुलझ पाते है आजकल वो लोग,
जो खुद को किसी के भविष्य के शिल्पकार समझ बैठे है ।।

अपने अहम को अपने अतीत से जोड़ कर रखना "चौहान",
राख पड़े है शमशान में वो भी जो खुद को भगवान समझ बैठे है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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