Wednesday, 16 May 2018

"हमारी बेटियाँ-हमारी सोच" (HAMARI BETI HAMARI SOCH )


कब तक दुनिया के झूठे रिवाज़ो में पिसती जाएगी,
हाथ पैर बाँध कर कहते है बेटी मेरी दौड़ के दिखाएगी।।

कोशिश कभी की ही नही ख़्वाईश जानने की उसकी ,
पँख नोंच कर कहते है देखना अभी उड़ कर दिखाएगी।।

कपड़ों से नापी जाती है अब तो इज्ज़त यहाँ पर,
साड़ी में बदन दिखाएगी तो संस्कारी कहलाएगी ।।

करेगी सपने पूरे अपने माँ बाप के इस देश की बेटियां
"चौहान" पर खुद के सपनो की लाश कहाँ दफ़नाएँगी।।

होश है हालातों का पर किनसे है ये होश नही ,
ज़िंदा ही कभी थी बेटी जो डर हो के कहीं मर जाएगी।।

ख़्वाब तू भी देखना और पूरे करना मगर शादी के बाद,
अमानत परायी है यहां तो बस कुछ वक्त ही बिताएगी ।।

कहने को कंधे से कंधा मिलाएगी लाडो मेरी लड़को से ,
पर इस आँगन की तुलसी आँगन से बाहर ना जाएगी ।।

माँ ,बेटी, बहु  बहन ,बहुत से किरदार निभाएंगी ,
खुद का अस्तित्व मिटा तू कहाँ तक जीती जाएगी।।

कहाँ फर्क पड़ेगा "चौहान" तेरी बातों का ज़माने पर,
ना समझ है जब खुद पर गुज़रेगी तब समझ आएगी ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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