देखो ये आईना है सब सच बताता है ,
ज़ुबाँ नही है इसकी पर सब कह जाता है ।।
सब देख कर भी अनदेखा कर देते है लोग यहाँ ,
खुद पर गुज़रे तो अंधे को भी नज़र आता है ।।
बनाने वाले को गुरुर नही करसाज़ी पर अपनी,
चंद तमाशे दिखा इंसानों को खुद में भगवान नज़र आता है।।
आजकाल कौन किसकी खुशी देखकर खुश है यहाँ,
वक़्त पड़ने पर तो गधे में भी इन्हें बाप नज़र आता है।।
सच्चाई की सरबत कौन पीना चाहता है जनाब,
इनके लिए वही अच्छा है जो झूठ का ज़हर पिलाता है ।।
बुराईयां सबकी नजर आती है आजकल सबको यहां,
खुद के दामन में कितने दाग है को जानना चाहता है ।।
गिन-गिन के हिसाब लेगा वो अदालत में अपनी ,
ख़ामोश ज़रूर है वो पर तेरी रग-रग पहचानता है ।।
तेरी उम्र से अंदाज़ा लगते है "चौहान" लोग तेरी उड़ान का,
नही जानते वक़्त का सिखाया है अपनी हद्द पहचानता है ।।
ख़ामोश रहने दो तुम "चौहान" को और उसकी कलम को,
बेवकूफ है जब भी बोलता है पागल सच बोल जाता है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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