जब से तुझे मेरे ज़िस्म ने रूह सा बना लिया ,
खुशियों ने तो जैसे मुझसे नाता ही छुड़ा लिया ।।
गुरुर होने लगा तुझे मेरी मुहोब्बत का खुदपर,
मेरे अरमानों ने मेरे दिल को शमशान बना दिया।।
खुले आसमान की ख़्वाईश ले के जीता था कभी,
आज बंद कमरे को ही अपना जहाँ बना लिया ।।
कभी मुस्कान नही हटती थी चहरे से जिसके आ देख,
लबों पर खामोशी और आंखों को समन्दर बना लिया।।
इतनी शिद्दत से इबादत तो खुदा भी क़बूल कर लेता,
क्या पता था किसी पत्थर को भगवान बना लिया ।।
हासिल भी क्या होता मुझे दर्द-ए-मुहोब्बत के सिवा,
क्या हुआ उसके दिए ज़ख़्मो को नासूर बना लिया।।
भर लिया हमने तेरे दर्दों-गम से आज दामन अपना ,
खुश है के अपनी खुशियों से तेरा आँगन सजा दिया।।
अंज़ाम पता था हमे मुहोब्बत का अपनी बस इसलिये,
तेरे शहर से आशियाना अपना हमने ख़ुद जला दिया।।
सिर्फ अल्फ़ाज़ पढ़ती है ये दुनिया तेरे "चौहान",
क्या पता के एहसासों को तूने दिल मे ही छुपा लिया।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।

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