आज बात इश्क़ की करते है वो ,
जिस्म की ख़्वाईश रखते है जो ।।
इंसानियत बेच कर आये है ,
धर्म के ठेकेदार बनते है जो ।।
कहाँ झुकते है सिर किसी दर पर,
बात मज़हब की करते है जो।।
सच की रोशनी से डरते है वो,
झूठ के अंधेरे में पलते है जो ।।
अपना ज़मीर तक बेच कर बैठे है अपनी ,
झूठी इज़्ज़त का दिखावा करते है जो ।।
नक़ाब पहन रखते है मासूमियत का ,
हैवानियत की आग में जलते है जो।।
जीने की ख़्वाईश ना कर "चौहान" आईना सच का दिखाकर,
रातों-रात दफ़न हो जाते है यहाँ सच उगलते है जो।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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