एक किताब लिखुँगा,
कुछ वादे , कुछ हिसाब लिखुँगा।।
जो टूट कर बिखर गए मेरे ,
वो सारे ख़्वाब लिखुँगा ।।
लिखुँगा बेपरवाही किसी की ,
किसी के दर्दों का जवाब लिखुँगा।।
लिखुँगा तेरे दामन की खुशियां सारी,
मेरे जिस्म पर ज़ख्मों का लिबाज़ लिखुँगा।।
नही लिखता अब कहीं नाम तेरा ,
पर तेरा ये मुहोब्बत-ए-अंदाज़ लिखुँगा।।
नासूर बन कर रह गए जो इस दिल पर ,
तेरी दी वो सारी इश्क़-ए-सौंगत लिखुँगा।।
मंज़िल तक मेरे साथ आना तो दूर ,
जो बीच राह में छुड़ा गए वो साथ लिखुँगा ।।
नही लिखता दिन की बेचैनी ,रात की तन्हाई ,
पर जो तूने कही हर वो बात लिखुँगा ।।
माना अब नही होती शाम ज़िंदगी मे ,
पर हर शाम तुझसे हुई मुलाकात लिखुँगा।।
जब रह जायेगा आखिरी पन्ना किताब का,
"चौहान" इस कहानी की एक नई शुरुआत लिखुँगा।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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