Wednesday, 30 May 2018

"लौट के आ जाते -3" (LAUT KE AA JATE-3)


कहकर तो देखा होता राह में तेरी जान भी बिछा जाते ,
क्या होता जो घड़ी भर को तुम लौट के आ जाते।।

मुंतज़िर थे हम तो कबसे उस रात के जो गुज़रे तेरे साथ,
चाँद तारे ना सही जुगनुओं से मेरी राहें सजा जाते ।।

खोंफ़-ज़दा थे हम तो तुमसे दूरियों को लेकर,
उम्र भर ना सही दो कदम तो साथ निभा आते ।।

बोला तो होता के इश्क़ की कीमत जान है हमारी,
ज़रा इशारा करते हम खुद खंज़र-बदस्त हो आते।।

कोई गिला ना रहता फिर हमें 'गर इस दिल-ए-गुलिस्तां में,
रुत फ़िज़ाओं वाली ना सही खिज़ा बनकर ही आ जाते।।

हर्फ़-हर्फ़ लिखा है चौहान ने अपना लहू भर तहरीर में ,
मेरे दिल की दीवारों से वो अपना नाम ही मिटा जाते ।।

क्या होता जो घड़ी भर को तुम लौट के आ जाते।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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