थोड़ी उलझन है कही बातों की ,
शायद ही सबको समझ आएगी ।।
हुई बात पक्की तो लड़के की माँ बोली,
बहु नही हमारी बेटी बनकर घर आएगी।।
बाप ने विदा कर बेटी को उनकों सौप दिया,
क्या पता था सास कहीं अपनी बात भूल जाएगी।।
उसके लिए तो सब जैसे एक सपना-सा था,
पता ज़रूर था के यही अब ये उम्र गुज़र जाएगी।।
बेगाना था अब वो आँगन जिसमे बचपन गुज़रा था,
किसने सोचा के वो यादें कैसे भूला पाएगी ।।
सास को माँ ,ससुर को बाप, मान कर आई थी जो,
कभी सोचा ही नही यहां बस परायी बनकर रह जायेगी।।
घर वाले तो होंगे पर अब वो मनमर्ज़ी ना होगी,
कहाँ ना जाने वो अपने सपनो की कब्र बनाएगी ।।
बेटी होती तो शायद आराम भी कर लेती ,
बहु है सब काम करके ही खाना खायेगी ।।
नज़रअंदाज़ होंगी तो बस वो गलतियां बेटी की ,
बहु है बिना गलती भी सहमी सी नज़र आएगी।।
तरसेगा मन उसका भी घर अपने जाने को फिर,
बिना इज़ाजत वो एक कदम भी बढ़ा ना पाएगी ।।
सोचती होगी वो भी मन मार के फिर अपना ,
के बेटी थोड़ी हूँ जो महीनों भर रुक जाएगी।।
लाज माँ-बाप की रखने की खातिर,
सारी ख्वाइशें अपनी मार गिराएगी ।।
घूँट सब्र का फिर पीना पड़ेगा ज़हर सा "चौहान",
ये सोच के ख़ामोश है शुरुवात है आदत पड़ जाएगी।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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