Saturday, 2 June 2018

"फिर-मुहोब्बत" (PHIR MUHOBBAT)


तरसना है फिर से ,तड़पना भी है ,
जीना भी है तो फिर से मरना भी है ,
तोड़ना है खुशियों से नाता अपना,
दोस्ती अब फिर उदासियों से करनी है ,
हाँ मुझे फिर मुहोब्बत करनी है ।।

फिर से बहाना है वो आंखों का समुन्द,
फिर से डूबना है खुद को गम के अंदर,
तोड़ना है नींदों से नाता अपना ,
आज फिर से ये रातें काली करनी है ,
हाँ , फिर मुहोब्बत करनी है ।।

फिर किसी को मंज़िल बना मुसाफ़िर बनना है,
फिर किसी को खुदा बना कर काफ़िर बनना है,
बना कर नासूर पुराने घाव अपने ,
फिर नए ज़ख़्मो की चाहत करनी है ,
हाँ , फिर मुहोब्बत करनी है ।।

फिर ये गालियाँ दिल की वीरान करनी है ,
फिर ये ज़मी दिल की शमशान करनी है,
फिर  जोड़ना है नाता तन्हाई से अपना ,
फिर "मेरी कलम" से "दिल की ज़ुबाँ" लिखनी है,
हाँ , फिर मुहोब्बत करनी है ।।

तेरी खुशी के लिए मौत की चादर ओढ़ जाऊंगा मैं,
तू माने ना माने रिश्ता मरकर भी निभाउंगा मैं,
निकाल कर जिस्म से ये रूह अपनी "चौहान" ,
फिर तुझे रूह बना जीने की हसरत करनी है ,
हाँ ,मुझे फिर मुहोब्बत करनी है ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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