Saturday, 1 February 2020

"जज़्बात" (JAZBAAT)


एक रात जी भर के रोना चाहता हूँ,
तेरी गोद में सिर रख कर माँ सोना चाहता हूँ।।

अब यूँ बिखर-बिखर कर जीना बर्दाश्त नही होता,
अब आज़ाद इस दुनिया से होना चाहता हूँ।।

एक एक मंज़र आंखों में घर कर गया है,
ख़्वाब सारे जला कर राख होना चाहता हूँ।।

बहुत ऐतबार कर लिया जमाने पर मैंने,
अब मैं भी मेरे सपनों का गुनहगार होना चाहता हूँ।।

हर किसी ने तो पीठ में खंज़र घोपा है मेरे,
खुदगर्ज़ मैं भी आज उनकी तरह होना चाहता हूँ।।

हर वक़्त तो साथ खड़ा था मैं सबके ,
अब मैं भी वक़्त आने पर मुकर जाना चाहता हूँ।।

सब झूठे है ये रिश्ते नाते आज के दौर में,
मेरे अपनो की तरह मैं भी फायदा उठाना चाहता हूँ।।

बहुत कुछ बात है जो मेरे साथ दफन हो जायेंगी,
एक दफा आ "चौहान" तुझे सब बताना चाहता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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