सब कुछ लुटा दूँ तुम पर,
अभी चाहत इतनी तो नही ,
हर दुआ क़बूल हो जाये ,
अभी इबादत इतनी तो नही,
वो जो चाक पर चढक़र कोई आकर ले ले,
हाँ सच मैं वो मिट्टी भी तो नही,
बुरा हूँ किसी की ज़िंदगी तो नही,
जरूरी हो सकते है पर एक हद तक,
जिस्म में रूह इतना लाज़मी तो नही,
इश्क़ करता होगा कोई मुझसे भी,
पर हमपर जान लुटा दे इतना तो नही,
यकीन रख पर हद से ज़्यादा नही,
मैं गलती ना करूँ , यार मैं खुदा तो नही,
हाँ,कोई ना कोई वजह होती है लिखने की,
मैं बेवज़ह लिखता हूँ ये गुनाह तो नही,
मैं क्या हूँ ?? कैसा हूँ?? कौन हूँ?? क्यूँ लिखता हूँ??
मत पूछ,
मैं अब बार बार तुम्हे लिखकर यही समझाता रहूँ,
नही!! मैं इतना भला भी नही।।
कुछ तो है जो ये लोग कहानियाँ सुनाते है अपनी,
वरना कलम उठे और हाल-ए-दिल बयाँ कर दे,
"चौहान" ग़ालिब का सगा तो नही।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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