सुन आज मुझे तेरा शहर बुला रहा है,
जो गालियाँ बरसों पहले छोड़ आया था,
कोई उन गलियों में वापिस ले जा रहा है,
वो बचपन , वो लड़कपन,
आज सब याद आ रहा है,
एक घर था हँसता खेलता,
आज वो वीरान नज़र आ रहा है,
सुन आज मुझे ....
दिल के सागर में जज़्बातों के उफान है,
थोड़ी झिझक भी है,
खुद पर काबू भी ना हो पा रहा है,
मिट्टी की खुशबू, राह की रहगुज़र,
ऐसा लग रहा है,
कोई जवानी से बचपन मे ले जा रहा है,
सुन आज मुझे ...
कुछ रिश्ते नाते, यारों की यारी,
बार बार एक गली से गुजरना,
देखना एक सूरत प्यारी,
जाने-अनजाने सही ,
ज़िंदगी मे नया मोड़ आ रहा है,
सुन आज मुझे...
ज़िंदगी की किताब में माना,
"चौहान" एक पन्ना बाकी है,
थोड़ी इज़ाज़त दे दे खुदा,
अभी वो गाँव देखना बाकी है ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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