इश्क़ करूँगा तुझसे बेइंतहा,
पर आज भी मेरा पहला इश्क़ मेरी माँ है।।
जी तो नही सकता तुम दोनों के बिना,
पर फिर भी उसकी रज़ा में मेरी रज़ा है।।
रूठता है तो रुठ जाए वो भगवान भी,
मेरे लिये तो मेरा भगवान मेरी माँ है।।
वो पूरे तो नही कर सकती ख़्वाब मेरे,
पर रोज़ पूछती है बता तेरी रज़ा क्या है।।
मैं जो भी हूँ जैसा भी हूँ दुवाएँ है उसकी,
माँ-बाप से बढ़कर दुनिया मे है ही क्या है।।
ये उसकी दुवाओं अरदासों का असर है,
वरना मेरी किस्मतों में लिखा ही क्या है।।
ये जो इश्क़ के लिए माँ को भूल जाते है,
कभी देखना किस्मत में फिर बचा क्या है।।
मुहोब्बत में मंज़िले कब किसे मिली है "चौहान",
बंदिशों से निकल माँ भी तेरी है इश्क़ भी तेरा है।।
इश्क़ कर "चौहान" पर कोई उम्मीद मत रख,
उम्मीद पूरी होने पर चाहतों को मरते देखा है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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