Friday, 15 February 2019

"इंसाफ़" (INSAAF)


हुकूमत तुम्हारी तुम रखो,
ना तुम्हारा तख्तो-ताज चाहिए,
कुछ मिट्टी हो गए मिट्टी के लिए,
उनके लिए इंसाफ चाहिए,
आज शहादत पर अश्क़,फूल नही,
खून के बदले खून का रिवाज चाहिए,
ताह उम्र का कर्ज है सबपर आज,
ना कोई रिवायत, ना लिहाज़ चाहिए,
टूटने दो बेड़ियाँ शराफत की आज,
इन परिंदों को परवाज़ चाहिए,
'गर बिछती है तो बिछ जाने दो लाशें,
एक नई जंग का आगाज़ चाहिए,
अहिंसा की नही हिंसा की जरूरत है,
हर एक दिल मे इंकलाब चाहिए,
मिटा दो वजूद वतन-परस्तों का,
हर कतरे लहू का इंसाफ चाहिए,
"चौहान" ये धरती माँ है अपनी,
इसके आँचल पर ना कोई दाग चाहिए,
झूलते है तो आज भी झुल जाए फाँसी,
पर हर एक घर मे भगत सिंह, आज़ाद चाहिए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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