तुझे नही मैंने खुद को खोया है,
रोया है, मेरी रूह ,मेरा दिल ही नहीं,
अपने कर्म पर तो ये वक़्त भी रोया है,
तुझे नही मैंने खुद को खोया है।।
कुछ की यादों में बरकरार है तू,
कुछ ने भुला दिया है तुझे,
वो आज भी बेसुध पड़े है,
जिन्होंने तेरे आने का अरमां सँजोया है।।
कुछ अपने मन को समझाकर बैठे है,
कुछ साग़र आँखों का बहाकर बैठे है,
कुछ तेरी तस्वीर से बातें कर लेते है,
कोई तेरा पहरान अपने जिस्म से लगाकर सोया है।।
कुछ के लिए तू वक़्त की तरह निकल गया है,
कुछ के लिए तू शाम की तरह ढल गया है,
नकाब ओढ़ कर रखा है हँसी का चेहरे पर,
कोई है जो तेरी याद में दिन रात बेवक़्त रोया है।।
तेरी जगह तो कोई ले ही ना पाया,
दोस्त अपना तेरे जैसा किसी को कह ही ना पाया,
तुझे तो आज अभी मांग लूँ खुदा से मैं पर,
जहाँ गया है तू वहां से कोई लौट ही ना पाया है।।
सिर्फ लिखकर बयाँ कर दूं,
ऐसा कोई फसाना नही था,
तेरे जिस्म के साथ राख हो जाये,
ऐसा हमारा याराना नही था,
मज़बूर हूँ वक़्त और हालातों के आगे,
सच है "चौहान" ने इस जिस्म से रूह को खोया है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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