आज बरसों बाद मेरी उससे मुलाकात हुई,
नज़रों-नज़रों में ही हमारी बहुत सी बात हुई।।
कुछ सवाल थे जिनका वो जवाब जानना चाहती थी,
हाँ बोली नही कुछ पर मेरा हाल जानना चाहती थी।।
नज़र ही नज़र में एक दूसरे को गले लगा बैठे थे,
कुछ पल को आस पास सब कुछ भुला बैठे थे।।
शायद आज वो अपने अतीत पर पछता रही थी,
शायद उससे वो कसमें, वादे, बातें याद आ रही थी।।
बड़े वफादार थे आंसू वो जिसको रोक कर रखा था,
मेरी तरहा उसने भी हँसी का नकाब ओढ़ रखा था।।
शायद वो भी उसी दौर में कहीं खो गयी थी,
ऐसा लगा इन लम्हों में मेरी फिर हो गयी थी।।
मुझसे दूर होकर आज वो भी पछता रही थी,
ऐसा लगा जैसे आज भी वो अपने पास बुला रही थी।।
कभी सोचा था उसने भी के इश्क़ में ऐसा मोड़ आएगा,
जिसे ज़िंदगी समझा नाता वहीं एक दिन तो जाएगा।।
फ़िर समझौता कर हालातों से हम अलविदा कह गए,
इश्क़-ए-बारिश में भीग कर "चौहान" सूखे ही रह गए।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।

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