जैसी मेरे ख्यालों में तस्वीर नज़र आती थी,
हाँ हक़ीक़त में भी कुछ ऐसी ही हो तुम।।
वो घनघोर घटाओं जैसी काली घनी ज़ुल्फ़ें,
चहरे का नूर मानो आफ़ताब की चमक हो तुम।।
ना जाने कितने राज़ कैद है आँखों मे तेरी,
किसी शायर की लिखी ग़ज़ल हो तुम।।
क़बूल हर सज़दे हो रहे है एक झलक से तेरी,
नाम इबादत है तेरी और उस खुदा सी हो तुम।।
बड़ी फुर्सत से तराशा है उस खुदा ने तुम्हें,
ख़ुदा की बरसाई मुझपर रहमत हो तुम।।
कैसे भुला दे हम एक पल भी तुम्हें,
मेरे जिस्म में रूह सी ज़रूरत हो तुम।।
जिसे देख खुदा भी खुद पर नाज़ करे,
हाँ खूबसूरत से भी खूबसूरत हो तुम।।
क्या बताये "चौहान" के कैसी हो तुम,
मुहोब्बत को भी मुहोब्बत हो जाये ऐसी हो तुम।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
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