Wednesday, 20 February 2019

"एक वक्त था" (EK WAQT THA)


जानती हो अब वो लहरें किनारे तक नही आती ,
एक वक्त था जब वो पैरों की भीगा कर जाती थी।।

अब तो शाम भी ना जाने कब ढल जाती है ,
एक वक्त था जो मुलाकात को ओर हसीन कर जाती थी।।

जानती हो अब तो वो रास्ते भी सुनसान नज़र आते है,
एक वक्त था जिनपर चलकर तो मंज़िल नही भाती थी।।

अब कहाँ वो खुशबू है इस ज़िस्म में तेरे ज़िस्म की,
एक वक्त था जब वो खुशबू साँसों को महकती थी।।

ढूंढती रहना अब तुम खुद को मेरी इन् कविताओं में,
एक वक्त था जब "चौहान" के ख्यालों से भी दूर जा ना पाती थी ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

2 comments:

  1. बयाँ ए अंदाज कुछ एसा है तुम्हारा "चौहान"" तारीफ लिखे बिना रह नही पाता।

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