लिखूंगा कभी,अभी बहुत कहानियाँ अधूरी है,
ख़ामोश तो हूँ पर ये सब भी बताना ज़रूरी है।।
ज़रूरी है आज खुद को खुद में जिंदा रखना,
अपने वजूद का एहसास दिलाना भी ज़रूरी है।।
रोक नही पाता कभी कभी शैलाब आंखों का,
सुना कुछ ज़ख़्मों को नासूर बनाना भी ज़रूरी है।।
यूँही नही लिखा जाता हाथों की लकीरों में नाम,
किसी का ख्वाबों से हकीकत में आना भी ज़रूरी है।।
ज़रूरी तो नही के सब कुछ हासिल हो हमें,
किसी की खातिर खुद को मिटाना भी ज़रूरी है।।
सभी ख्वाईशें पूरी नही हो पाती "चौहान" यहाँ,
कुछ अरमानों को राख बनाना भी ज़रूरी है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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