वो कभी हक़ीक़त में तो कभी ख्वाबों में रहती है,
एक लड़की है जो मेरे सवालों के जवाबों में रहती है।।
थोड़ी चुलबुल है शरारती है हाँ थोड़ी नादान भी है,
कितना समझता हूँ उसे इस बात से अनजान भी है।।
उसके चेहरे की हँसी मेरे चेहरे पर मुस्कान लाती है,
बेखबर है उसकी उदासियां उदास मुझे कर जाती है।।
रिश्ता क्या है उससे मेरा कभी समझ ही नही पाया,
दोस्त से बढ़कर है पर हद से अपनी निकल ना पाया।।
यूँ तो बातें ना जाने कितनी उससे कह जाता हूँं,
अपने ही जज़बातों का मज़ाक बना चुप रह जाता हूँ।।
चाहता हूँ कि कभी तो वो थोड़ा खुद से समझ जाएं,
डरता हूँ कहीं उसकी खुशी गम में ना बदल जाए।।
हाँ कभी कभी उसे उलझन मेरी बातों से हो जाती है,
मज़बूरी पता है शायद तभी खुद को रोक जाती है।।
कब समझेगी उसके हर एहसास में खुद को जीता हूँ,
खामोशी से अपने जज़्बात कागज़ पर लिख लेता हूँ।।
फिर भी वो मेरे जज़्बात मेरा हाल जानना चाहती है,
बेवजह वो भी सवालों के जवाब जानना चाहती है।।
डर लगता है "चौहान" जज़बातों को लफ़्ज़ों में ना पीरों दूँ,
आज हमराज़ हूँ उसका कल आगे बढ़ दोस्ती भी ना खो दूँ।।
कहना तो बहुत कुछ है पर शायद उस हक से कह नही सकता,
रिश्तों की समझ नही पर पल भी तेरे बिना रह नही सकता।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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