Wednesday, 19 September 2018

"शायर" (SHAYAR)


लिखने वाले तो हर वक़्त लिख लेते है ,
मैं तो बस तन्हा रातों को लिखता हूँ।।

शायर तो वो हैं जो हर हाल पर लिख लेते है,
मैं तो बस तेरे-मेरे जज़बातों को लिखता हूँ।।

नही आती मुझे बातें चाँद तारों की करनी ,
बस मैं तो बात तेरे दीदार की लिखता हूँ।।

नही पता नशा क्या होता है महखाने की शराब का,
मैं तो तेरे इस नूरे-हुस्न के शबाब पर लिखता हूँ।।

वो स्याही और होगी फीके पड़ जाते है अल्फ़ाज़ जिसके,
मैं तो लहू से अपने हाल-ए-दिल की किताब लिखता हूँ।।

लिखा तो कई दफ़ा पर कभी भेज ही नही पाया तुम्हे,
दफ़न होकर रह गयी ख़त में जो आज वो बात लिखता हूँ।।

क्या करूँ गर कोई समझ ही नही पाता मेरे जज़बातों को,
मैं तो अक्सर चींखती खामोशियों की आवाज़ लिखता हूँ।।

हाँ कुछ अनकही बातों ने "शायर"बना दिया "चौहान",
पर कौनसा ग़ालिब की तरह इश्क़ का ख्वाब लिखता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


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