कुछ मिल गए कुछ बाकी है, पन्ने मेरी खोई किताब के,
कुछ जल गए कुछ बाकी है,पन्ने मेरी कोई किताब के।।
हर कहानी हर किस्से हर सपने पूरे होते थे कभी इसमें,
मेरी तरह सब कुछ अधूरे हैं आज मेरी खोई किताब के।।
कभी संभाला भी था तो कभी बच्चों सा पाला भी था ,
बचपन की तरह ही हो गए पन्ने मेरी खोई किताब के।।
कभी महके है हवाओ में तो कभी बिखरे भी है हवा से,
बेमौसम फूलों से हो गए पन्ने मेरी खोई किताब के।।
कुछ ज़हन में अड़ गए कुछ ज़ुबाँ पर लोगो की यूँ चढ़ गए,
चर्चे आज महफ़िल-ए-आम हो गए है पन्ने मेरी खोई किताब के।।
नाम होकर भी गुमनाम रहा एक अरसे तक "चौहान",
राख क्या हुआ मेरी पहचान ही बन गए पन्ने मेरी खोई किताब के।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wow this one is unique and beautiful..keep up the good work
ReplyDeleteThanks alot 😍😍😍
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