Wednesday, 22 April 2020

"ये लोग" (YE LOG)


ना जाने कितने नक़ाब चहरे पर लगाते है लोग,
ये कैसा भरोसा के बार बार आजमाते है लोग।।

मतलब से बात करते है ये अपनापन दिखाकर,
जरूरत के वक़्त ना जाने कहाँ चले जाते है लोग।।

राज़ सब जान लेते है ये चंद बातें अपनी बताकर,
हमराज़ बनके लोगों में फिर मज़ाक बनाते है लोग ।।

भूख प्यास कहाँ नज़र आती है किसी की इन्हें,
दो रोटी खिला दस अखबारों में छपवाते है लोग।।

कहाँ अब कोई मरहम बनेगा यहाँ किसी का,
दूसरों के जख्मों पर नमक ही लगाते है लोग।।

वो जमाने और थे कला का मोल कलाकार का था,
अब तो "चौहान" दूसरों के हक का खाते है लोग।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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