Tuesday, 28 April 2020

"इल्ज़ाम" (ILZAAM)


जज़्बात कहाँ लिख पाता हूँ मैं,
दिल की बात कहाँ लिख पाता हूँ मैं,
मैं तो खुद जुंझ रहा हूँ ज़िंदगी मौत के बीच,
सच कहाँ तुमने हालात कहाँ लिख पाता हूँ मैं,
जैसी मुहोब्बत थी है हाँ वैसी तो नही दिखता,
क्या सच क्या झूठ मालूम नही मुझे,
बस ये जानता हूँ गुनहगार हूँ मैं,
पर तुझपे कोई इल्ज़ामात नही लगाता,
फर्क नही पड़ता अब फर्क पड़ता है या नही,
मैं तो आज भी तुझे खुद से अलग नही बताता,
मिलना ना मिलना तो मर्ज़ी है खुदा की,
मुहोब्बत की लाश कंधों पे उठाये फिरता हूँ,
थोड़ा मगरूर हूँ तभी कहीं नही दफ़नाता,
मेरी जगह खुद को लाकर देख,
जीते जी ज़िंदगी को मौत बनाकर देख,
चहरे पर नकाब है हँसी का,
"चौहान" अपने हालात नही दिखता,
माना तेरा कहना ठीक है मैं सच नही लिखता,
ये भी सच है तू मुहोब्बत है मेरी,
मैं तुझपर कोई इल्ज़ामात नही लगाता,
तेरी भी मजबूरियां समझता हूँ मैं,
तभी आजकल इश्क़ नही लिखता लिखाता,
अब आबाद हूँ बर्बाद खुदा जाने,
तेरे लिए रोज़ पल पल मरता हूँ,
एक तेरी ख़ातिर नाम कभी तेरा ज़ुबाँ पर नही लाता।।
सच बस इतना है,
मुहोब्बत में तुझपर "चौहान" कोई,
इल्ज़ाम नहीं लगता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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