एक ज़ख्म, एक नासूर, एक दर्द, बाकी है,
क्हाँ इल्म था तूफां का,सोचा था बस रात बाकी है।।
वो आया ,मिला और बस चला गया ,
हम बेखबर सोचते रहे ,मुलाकात बाकी है।।
बड़ी शिद्दत से सिर झुकाए बैठा रहा,
उम्मीद थी पत्थरो की करामात बाक़ी है।।
सोचा था के इस बार गले लगेगा वो हमसे,
कहाँ पता था के हमपर इल्ज़ामात बाकी है।।
बड़ी कोशिशें की हमनें रोकने की उसे,
किसी ने झुठला दिया की एक आस बाकी है।।
आज मेरी कब्र की मिट्टी खोद रहे है वो,
इस उम्मीद में "चौहान" के साँस बाकी है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Hmmmm
ReplyDeleteNice Bhai 💕
ReplyDeleteThanks bro 😍😍😍
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