ना जाने कैसे महबूब से दिल लगा बैठे है,
खुद अपनी मुहोब्बत को मज़ाक बना बैठे है।।
कागज़ पर उतरे थे हमनें अरमान लफ़्ज़ों में,
आज अपने हाथों से उनको राख बना बैठे है।।
बड़ी रौनकें थी मेरे दिल की इस बस्ती में,
आज उस बस्ती को हम श्मशान बना बैठे है।।
महफिलों की शान हुआ करते थे कभी हम भी,
ये अलग बात है, तन्हाइयों को पहचान बना बैठे है।।
मुहोब्बत भी नही इबादत भी की है हमनें उसकी,
हाँ सच है पत्थरों को हम भगवान बना बैठे है।।
गलती ये नही "चौहान" की मुहोब्बत तुमसे हुई ,
गलती ये है कि एक शायर को जान बना बैठे है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

ReplyDeleteना जाने कैसे महबूब से दिल लगा बैठे है,
खुद अपनी मुहोब्बत को मज़ाक बना बैठे है। Kill heart lines brother ♥️
Thanks bro 😍😍😍
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