मैं खुद की ही तलाश में दर-ब-दर भटकता हूँ,
ये कैसे ख़्वाब है जिनके लिए दिन-रात जगता हूँ।।
कुछ तो ऐसा है जो अभी इतनी जल्द होना नही था,
ये जिस्मानी लिबास क्यूँ अब तक साथ लिए फिरता हूँ।।
क्यूँ अब मंज़िलों पर आकर भी मुझे आराम नही,
ये कैसी तन्हाई है जो अब भी साथ लिए फिरता हूँ।।
तुझे खो तो मैं कब का चुका हूँ इस दुनिया में,
फिर क्यूँ आज भी तुझसे जुदाई से डरता हूँ।।
कुछ हालात भी समझ नही आते अब तो मुझे,
अब अंधेरो से नही मैं इस रौशनी से डरता हूँ।।
सोचा था के लिख के बयाँ कर दूँ मैं जज़्बात अपने,
अश्क़ नही रुकते जब जब हाथ मे कलम पकड़ता हूँ।।
और किन पैमानों पर नापू "चौहान" मुहोब्बत अपनी,
तेरी कब्र पर रोज़ नाम अपना लिख के गुज़रता हूँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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