Tuesday, 14 April 2020

"एक रोज़" (EK ROZ)


मेरी रूह बनकर शामिल तू है जिस्म में,
जब निकलेगी रूह तो जिस्म छोड़ दूँगा।।

मेरी आती जाती हर एक साँस है तेरे नाम,
तेरे बिन मैं साँसों की माला भी तोड़ दूँगा।।

जब जुदा हो जाऊँगा खुद से,तेरे इश्क़ से,
मैं उस रोज ये सब लिखना भी छोड़ दूँगा।।

ये फ़ासले मंज़ूर है मुझे जो दुनिया ने दिये है,
फ़ासले जो तूने बढ़ाये मैं दुनिया ही छोड़ दूँगा।।

ये जिस्म पास नही हमारे पर रूह तो एक ही है,
नामुमकिन है कि तेरे हाल में जीना छोड़ दूँगा।।

ये दुनिया कोई आईना नही जो हक़ीक़त बताए,
बात इश्क़ पर आयी तो ये आईना भी तोड़ दूँगा।।

मेरा वजूद तब तक है यहाँ जब तक तुझसे जुड़ा हूँ,
तुझसे टूटा तो फिर ये दुनिया के रिश्ते भी तोड़ दूँगा।।

थोड़ा ज़िद्दी, नासमझ है "चौहान" इश्क़ की नगरी में,
लिखकर फैसले अपने फिर ये कलम भी तोड़ दूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

2 comments:

  1. Awesome Bhai
    .....

    मेरा वजूद तब तक है यहाँ जब तक तुझसे जुड़ा हूँ,
    तुझसे टूटा तो फिर ये दुनिया के रिश्ते भी तोड़ दूँगा।😍😍😍😍😍😍😍😍😍😍

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