Thursday, 9 April 2020

"अब" (AB)


हर रास्ते में नया रास्ता मिल रहा है,
मंज़िलें दूर हो रही है फासला मिल रहा है।।

हर किसी ने बोला था कि मंज़िल नही इस राह की,
थोड़ी आगे चला तो अब काफिला मिल रहा है।।

राह में बहुत पत्थर भी मिले और काँटे भी,
अब रास्ता खिला-खिला सा मिल रहा है।।

बड़े अनजान थे हम अजनबी शहर में तेरे,
अब सब कुछ मुझसे मिला-मिला सा लग रहा है।।

कोई होता तो जान भी जाता मेरी मुस्कान का राज़,
पूछता मुझे क्यों ये तकिया गीला-गीला सा लग रहा है।।

अब आएगा तो वो पूछेगा ज़रूर "चौहान",
रौनकें कहाँ है क्यों सब फीका-फीका सा लग रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

4 comments:

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...