Monday, 20 April 2020

"लिखता हूँ" (LIKHTA HOON)


वो "जान"लिखती है, मैं "चौहान" लिखता हूँ,
वो छुपा कर रखती है जज़्बात अपने,
मैं पागल उसको शरेआम लिखता हूँ,
वो मेरे रास्ते भी जानती है मंज़िले भी,
वो मेरे ख़्वाब लिखती है, मैं उसको मुकाम लिखता हूँ,
किसे ख़बर के ये शायरी है या ज़रिया बातों का,
वो एक शाम लिखती है, मैं अपनी जान लिखता हूँ,
हर कोई आज बेताब है सुनने को इश्क़-ए-दास्तां,
लोग मेरा नाम पूछते है,मैं उसे अपनी पहचान लिखता हूँ ,
हाँ, थोड़ा मुँहफट, थोड़ा बदतमीज़ लिखती है खुद को,
सबसे अलग है वो मैं उसे अपना अभिमान लिखता हूँ ,
उसकी खुशबू से महकती है साँसें मेरी,
वो मुझे फूल लिखती है ,मैं उसे गुलिस्ताँ लिखता हूँ,
कहना भी चाहती है और कुछ कहती भी नही है,
मेरे जीने की वजह है वो,उसको अपना ईमान लिखता हूँ,
क्या करना जाकर इन मंदिर, मस्जिद, मज़ारों, में,
मैं उसको अपना पीर-ओ-मुर्शद ,अल्लाह , भगवान लिखता हूँ,
तू मिला ना मिला खुदा उससे तेरी मर्ज़ी,
मैं तो हर जन्म अपने उसके नाम लिखता हूँ,
एक दर्द झलकता है आजकल बातों में उसकी,
मैं अपनी हर ख़ुशी आज उसके नाम लिखता हूँ ,
वो मुहोब्बत क्या जिसमे अफसोस हो ना मिलने का,
रूहानी इश्क है रग रग में अपनी मैं उसका नाम लिखता हूँ ,
उसकी ख़ुशी उसी हँसी सब मायने रखती है,
बस चला तो "चौहान" कदमों में उसके,
ये धरती, चाँद सितारे,ये आसमाँ लिखता हूँ,
इश्क़ में कुछ यूँ मतलबी हो गए है हम,
लोग बिस्मिल्लाह लिखते है ,मैं उसका नाम लिखता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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