Saturday, 18 April 2020

"इश्क़ के मुसाफ़िर" (ISHQ KE MUSAFIR)


इन काली तन्हा रातों में हम क्यूँ जागे रहते है,
जलने को परवानों से, हम क्यूँ आगे रहते है।।

ऐसा क्या है इस इश्क़ में, जो दीवाना करता है,
इश्क़ के दरिया में रोज़,लाखों आशिक़ मरते है।।

एक चहरे की तलाश में क्यूँ दर-ब-दर भटकते है,
एक नाम को ही ना जाने क्यूँ दिन रात ये रटते है।।

नींदों वाले ख़्वाब तो दुनिया देखती है "चौहान",
खुली आँखो में ही ना जाने कितने ख़्वाब पलते है।।

ना जाने कैसा रोग है,ना दवा कही, ना कहीं आराम है,
अंज़ाम पता है मौत है फिर भी, हँसकर गले ये लगते है।।

कहीं बातें समझ ना आती लिखी हुई किताबों की इनको ,
इश्क़ में तो देखो साहब ये लबो की ख़ामोशी भी पढ़ते है।।

कुछ कह गए, कुछ चुप रहे,कुछ मिल गए, कुछ राख हुए,
मरकर भी जो ज़िंदा है ,यहाँ फिर वही शायरी करते है।।

एक सोच में ही ज़िंदा है वो, जो हँस-हँस कर बाते करते है,
लिख के दर्द किताबों में यहाँ,फिर बैरागी बनके फिरते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


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