Friday, 24 April 2020

"हमें कहाँ तज़ुर्बा है" ( HAME KAHAN TAZURBA HAI)


रूठों को फिर से मनाने का,
किसी को अपना बनाने का,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

किसी के साथ चलते जाने का,
किसी को हमसफ़र बनाने का ,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

खामोशियाँ भी सही नही है मगर,
खामोशी को आवाज़ बनाने का,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

ज़ख्म जिसने दिए हमने लिए,
अब ज़ख्मो पर मरहम लगाने का,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

मैं एक काली घनी रात सा हूँ,
यूँ तारों सा जगमगाने का,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

इश्क़ मुश्क अपने बस की बात नही,
इश्क़ में हद से गुज़र जाने का ,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

तेरे दिल का हाल तू जाने,
ये हाल लिखने लिखाने का,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

दिल करता है तो लिख देता हूँ,
यूँ शायर बन जाने का "चौहान"
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

2 comments:

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...