एक दौर था कि घर में दरवाजे ही नही होते थे,
एक दौर है हम खुद को ही क़ैद करके सोते है।।
एक दौर था दर्द दूसरों के देख भी रो देते थे,
एक दौर है अपने ज़ख्मो पर भी ना रोते है।।
एक दौर था की सब्र था जो मिल गया उसमें,
एक दौर है सब पाकर भी निराश ही होते है।।
एक दौर था की हर रिश्ते की अहमियत थी,
एक दौर है कि रोज़ किसी को मारकर सोते है।।
एक दौर था की कच्चे घरों में भी सुकून मिलता था,
एक दौर है आलिशान बंगलों में भी बेचैनी होते है।।
एक दौर था कि खाना भी माँ पे पास बैठ खाते थे,
एक दौर है कि माँ बेटों के आशियाने भी अलग होते है।।
जब वक़्त था तब कदर ना कि हमनें इस वक़्त की,
आज उस वक़्त को याद कर "चौहान" बेवक़्त रोते है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Fabulous lines brother ♥️
ReplyDeleteThanks bro 😍😍😍
DeleteKate zhrr
ReplyDeletethanks
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