Monday, 17 February 2020

"मेरी कलम " (MERI KALAM)



हाँ, मुझे इल्म नही है इस बात का,
कब कहाँ अब लिखना क्या है,
कोई है बड़ा सौदागर इस बाजार का,
जज़्बात, हालात, ख़्वाब ,हक़ीक़त,
बता इनमें से यहाँ बिकना क्या है,
तुम जो बोलोगे ले आऊँगा इस बाजार में,
अच्छे ,बुरे ,सच,झूठ ,हर तरह के अल्फ़ाज़ है,
कोई बताये यहाँ नुमाइशों मे रखना क्या है,
सच लिखुँ , इतना तो मैं भी सच्चा नही हूँ,
जज़्बात लिखुँ, लिखने में इतना भी अच्छा नही हूँ,
हालात तो ज़ख्म है अब नासूर हो गए है,
सुना है तेरी इन शायरों की बस्ती में,
झूठ फरेब लिखने वाले मशहूर हो गए है,
कुछ लिखुँ के तुम्हे कोई सीख मिले,
इतना तो मैं भी सीख पाया नही हुँ,
एक दर्द का सैलाब लिए बैठा हूँ अपने भीतर,
पर जो जमाने को महसूस हो "चौहान",
ऐसा कुछ तो अभी लिख पाया नही हूँ,
अब तो मुहोब्बत भी लिखनी छोड़ दी है,
अब मंदिर मज़ारों के सामने से गुज़र जाता हूँ,
हाँ, प्रार्थना ,इबादत करनी भी छोड़ दी है,
एक और शक्श है मेरे अंदर,
जिसे कभी किसी के सामने ना लाता हुँ,
रोज़ रात मिलता हूँ उस से अकेले में,
उसका दर्द सुनता हूँ उसे बारहां समझाता हूँ,
यूँ कब तक किसी की याद में मरता रहेगा,
हक़ीक़त देख ,कब तक इस आग में झुलसता रहेगा,
कभी प्यार से तो कभी डाँट-फटकार से,
हर रोज़ मैं उसको समझता हूँ,
उसको कहता हूँ के देख,
आज एक भीड़ आयी है मेरा हाल जानने,
पूछने मेरी कहानी, मेरा दर्द बाँटने,
पर एक वो शक्श नही आया,
जिसे सीने से लगा अपना हाल बताना चाहता हूँ,
कहना चाहता हूँ के देख,
अब और नही होता ये ढोंग हँसी का, खुशी का,
आ तेरे सीने से लगकर रोना चाहता हूँ,
फिर हक़ीक़त में जी भर के मुस्कुराना चाहता हूँ,
बताना चाहता हूँ फिर जमाने को,
जो मैं हूँ हक़ीक़त में वही लिखता हूँ,
तुम मिले मुस्कुराए ,मैं मिला मुस्कुराया,
सब झूठ है "चौहान", मेरी कविता पढ़ ,फिर देख,
मैं कैसा हूँ और जमाने मे कैसा दिखता हूँ,
ये जो रोज़ पूछते हो मुझसे सवाल इतने,
सब समझ आ जायेगा कि मैं बेगाना होकर,
कैसे तुम्हारा दर्द समझता हूँ, कैसे मैं लिखता हूँ,
मेरी कहानी अब एक अंज़ाम माँगती है,
दो पल की सही तेरे साथ एक सुनहरी शाम माँगती है,
मौत दस्तक दे रही है, ज़िंदगी राह में अड़ी है,
अब और कुछ नही लिखना "चौहान",
मेरी कलम !! अब मुझसे इजाज़त माँगती है।।
अब मुझसे इज़ाजत माँगती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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