Thursday, 20 February 2020

"महादेव-कैलाशी" (MAHADEVA - KAILASHI)


किसी मीरा , राधा का कृष्ण नही बनना मुझे,
मैं बैरागी ठीक हूँ रंग दुनिया के नही रँगना मुझे।।

मुहोब्बत वो जो तुम्हारे हर रंग,रूप को स्वीकार करे,
जैसा पार्वती को महादेव, महादेव की सती के लिए।।

वो जो जल-थल शिला-धरा हर चीज़ में शामिल है,
कुछ ऐसे तू वास करे मुझमें मेरा रोम रोम कैलाश हो जाए।।

भूत पिशाचों की टोलियां है देवों का है देव तू,
पीकर विष का प्याला महादेव,सबके तुमने कष्ट हरे।।

कोई मंदिर में पूजता तुझे और कोई बैठा मशान में,
वो मत्यु जाल से निकल गया जिसका नाम तेरी ज़ुबान पे।।

तु अघोरी,तु अविनाशी,तू बैरागी, तू कैलाशी,
तन पे भस्मी , नाग गले मे, जटा में गंगा, चाँद मुकुट सजाए।।

ये देखो  शिवरात्री की में रात्रि में  नंदी गणों के सँग मिलके,
झूमे नाचे एक हाथ त्रिशूल उठा, एक हाथ से डमरु बजाए।।

एक तेरे रंग में खुद को रँगा के, तन पे धूणी भस्म लगा के,
तेरे मिलन की आश में भोले "चौहान" तेरा शिव नाम की रट लगाए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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