Monday, 24 February 2020

"ख़बर" ( KHABAR)


किसे खबर थी के ये ज़िंदगी अब यूँ ठहर जाएगी,
मंज़िल सामने पाकर भी मंज़िले दूर नज़र आएंगी।।

कर के अंधेरा आज मेरे दिल की नगरी में फिर वो,
रौशन वो अपनी ख़्वाईशो का शहर कर जाएगी।।

अंदाज़ अलग था उसका ज़ख़्मो पर मरहम लगाने का,
क्या पता था पतझड़ में पत्तों से हाल पूछने आएगी।।

बड़े गहरे है घाव वक़्त के भरने में ही नही आते,
किसे ख़बर थी ज़िंदगी अब ये रंग भी दिखलाएगी।।

सब कुछ तो मेरा ज़िंदगी ने छीन ही लिया मुझसे,
अब क्या ये ज़िंदगी मेरी ज़िंदगी लेकर जाएगी।।

बहुत सुना है "चौहान" के मौत हकीकत है सबकी,
बड़ा बेसबर हूँ कब आकर मुझे गले से लगाएगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




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