Wednesday, 20 November 2019

"तेरे पास" ( TERE PAAS)


पूछता हूँ रोज़ सवाल एक इस दिल से,
टूट कर भी छूटती आस क्यों नही,
क्यों बार बार टूट रहा है तू इस कदर,
क्यों दिल के सहरा को दरिया की प्यास नही,
क्यों नाउम्मीद नही होता जब की,
ये तू भी जानता है उसके आने की कोई आस नही,
क्यों इन ज़ख़्मो को नासूर बनाने पर तुला है,
तू खुद मरहम है इनका मरहम किसी के पास नही,
जानता है इस रास्ते का मुक़ाम मौत है,
वो हमसफर बनकर तेरे साथ नही,
तू जज़्बात बता रहा था ,
उसे कहानियां लग रही थी,
ऐसे पत्थरों को क्या पूजना,
जिसे तेरे दर्द का एहसास नही,
तूने लिख लिख किताबें काली कर दी,
लाश ही तो है तेरे अल्फ़ाज़,
हिलाकर देख इनमें अब बाकी साँस नही,
इंतज़ार की भी हद होती है "चौहान",
अलग नही हो पाती मिट्टी में मिली राख कही ,
हक़ीक़त तू भी जानता है तेरा दिल भी,
गर है जवाब तो फिर बता मुझे,
वो तेरा है तो फिर तेरे पास क्यों नही??
तेरे पास क्यों नहीं??


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

4 comments:

  1. Amazing lines but last line is 👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌❤️😍👍👍👏

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