Saturday, 23 November 2019

"रात भर" (RAAT BHAR)



तुझे किस बात का गम है,
क्यों तू भी मुझसा हो रहा,
मेरी तो गुज़रती थी रातें रो रोकर,
तू किस गम में रात भर रो रहा है।।

क्यों अपनी हदों को तोड़ आया है,
किसके ख़ातिर सब छोड़ आया है,
खुद से ही तोड़कर नाता आज तू,
बता मुझे किसका हो रहा है।।

तेरी नज़रों में वो खुदा सही,
उसकी नज़रों में इश्क़ गुनाह सही,
जिसे तू सुनना चाहता है हाल दिल का,
देख वो तो चैन से सो रहा है।।

इस मुहोब्बत के दलदल से कैसे निकल पायेगा,
क्या हुआ इश्क़ आफ़ताब है शाम होते ढल जाएगा,
देखा करेगा जोड़ कर खुद से कहानियाँ मेरी,
पूछेगा "चौहान" बरसो पहले लिखा अब कैसे हो रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

3 comments:

  1. Mai bhi ho hi gya badnam muhobbat k galiyo me teri hi tareh...vajud nhi jis rishte ka vo nibha rha hu....

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