मैं इसे कहुँ तो फिर क्या कहूँ,
मुझे तो ये मुहोब्बत नज़र आती है।।
पर ये भी तो सच है जमाने मे ,
मुहोब्बत तो दोनों तरफ से की जाती है।।
जिसमे फिक्र होती है एक दूजे के हाल की,
मिलने की हर पल बेकरारियाँ तड़पाती है।।
फिर ये कैसी मुहोब्बत है मेरी मेरे खुदा,
उसे मेरी कभी याद तक ना आती है।।
अपना सब कुछ तो लुटा बैठा हूँ उसके लिए,
क्यों उसे मेरी ये मुहोब्बत नज़र ना आती है।।
बड़े रंग देखे है दुनिया मे मुहोब्बत के मैंने,
कोई मिलता है तो कोई मिल के बिछड़ जाता है।।
इसमें ना कोई आस है ना कोई खोने का डर,
बड़ी सच्ची है ये एक तरफा मुहोब्बत कही जाती है।।
ठीक उस फकीर के जैसा हाल है मेरा इश्क़ में,
दिन राते दिदार के लिए इबादत में निकल जाती है।।
मैं भूल भी जाऊँ उसको "चौहान" तो गम नही,
ये कलम है मेरी जो हर लफ्ज़ में उसको लिख जाती है।।
माना इन रास्तों की कोई मंज़िल नही मगर,
हक़ीकत है के सच्चे इश्क़ में उम्मीद नही की जाती है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Very nice...����
ReplyDeleteThanks 😍😍
DeleteWaaaaahhh kyaaa baaaat hai.... Osssssm bro
ReplyDeleteThanks 😍😍
DeleteAmazing lines
ReplyDeleteThanks 😍😍
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