माना के वजूद नही है सच्ची मुहोब्बत का यहाँ,
पर यूँ हर किसी का हो जाना मुमकिन तो नही।।
रोशन तो सारे तारे भी है काली अँधेरी रात में ,
सबका हकीक़त में चाँद हो जाना मुमकिन तो नही।।
ज़ख़्म गहरे भी है और हरे भी हैं माना इश्क़ के,
हर किसी को ये सौग़ात मिल जाना मुमकिन तो नही।।
माना के बन जाती है हर नदी सागर ,सागर में मिल के,
सागर में मिलकर मीठा रह पाना मुमकिन तो नही।।
ये राह ज़िन्दगी की है यहां चलना अकेले पड़ता है सबको,
किसी का हाथ पकड़ कर मंज़िल तक जाना मुमकिन तो नही।।
मत आज़माओ किसी के यकीन तो तुम इतना,
हर कोई ख़ामोशी से चला जाए ये मुमकिन तो नही।।
गुरुर दौलत का हो या शोहरत का चढ़ता ज़रूर है अहम बनकर,
हमेशा बुलंदियों पर टिक पाना "चौहान" मुमकिन तो नही।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Nice bro
ReplyDeleteThanks alot bro
DeleteSuperb....👌👌💓💕💕💕💕💕
ReplyDeleteThanks 😍😍
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