Saturday, 18 May 2019

"पहला प्यार" (PEHLA PYAR)


देखते है उन्हें तो आंखों में इश्क़ का ख़ुमार भरते है,
दिन भर किसी की यादों में अपना दिन गुज़रा करते है,
जब नज़रे उन्हें देखने की गुज़ारिश बार-बार करती है,
जब किसी की खातिर सारे जमाने से तकरार करते है,
लगता है लोग शायद इसी को पहला प्यार कहते है।।

इश्क़-ए-समुन्दर में ख़्वाबों की नाव पर खुद को सवार करते है,
दरवाज़े पर खड़े हो जिसके गली से गुजरने का इतंज़ार करते है,
जिनको हम अपनी ज़िंदगी के हर रास्तों का मुक़ाम समझते है,
लगता है लोग शायद इसी को पहला प्यार कहते है।।

हर मंदिर मज़ारों में जिसे पाने की फरियाद करते है,
अपने नाम के साथ जोड कर जिसका नाम लिखते है,
उनकी हर एक अदा ,नज़ाकत शरारत को प्यार करते है,
लगता है लोग शायद इसी को पहला प्यार कहते है।।

हक़ीक़त कहुँ तो जिसको अपना खुदा परवरदिगार समझते है,
जो कभी मिलना ही नही फिर क्यों उसी से हम प्यार करते है,
तुझे समझ आती है तो मुझे भी समझा दे खुदा,
वो ज़मी मैं आसमान, क्यों हम अपने मिलन की राह तकते है,
लगता है लोग शायद इसी को पहला प्यार कहते है।।

"चौहान" को तो समझ आते नही तू ही बता दे खुदा,
क्यों वो अज़नबी की तरह आते है ,
रूह बन जिस्म से रूह निकाल ले जाते है,
रिश्ता तो तोड़ जाते है फिर क्यों उम्रभर,
जहन में एक याद बनकर रह जाते है,
एक फूल की तरहा ही तो है वो,
जिसे पास तो रखना चाहते है,
पर उसके मुरझाने के डर तोड़ भी ना पाते है,
फिर क्यों ऐसी चाहत को लोग,
इश्क़ मुहोब्बत का नाम बताते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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