Thursday, 23 May 2019

"खामोशियों के जवाब" (KHAMOSHIYON KE JAWAB)


एक रात गुज़री थी उसकी बाहों के आगोश में,
अब वक़्त थम सा गया है अब वैसी रात नही होती।।

खामोशियों से मिल रहे है खामोशियों के जवाब,
कैसे कह दूँ अब उससे मेरी बात नही होती।।

आते जाते लोग पूछते है मुझसे हाल तुम्हारा,
कैसे कह दूँ की अब तेरी मेरी मुलाकात नही होती।।

नज़र नही आते आजकल जो गवाह थे कल मुहोब्बत के तेरी,
कहीं छिप गए वो चाँद तारे या तेरे शहर में अब रात नही होती।।

सुना है आजकल तुम्हे नफरत सी हो गयी है बारिशों से,
मेरी याद सताती है या वो मुहोब्बत-ए-बरसात नही होती।।

वो जो ऊपर बैठा है, तेरे,मेरे ,सबके दिल का हाल जानता है,
वरना लोग अपनो को ही जानते यूँ अजनबियों से मुलाक़ात नही होती।।

इश्क़ कमा "चौहान" दौलत का क्या है, ये साथ नही जाती ,
मिट्टी हो मिट्टी में मिलना है सबको मिट्टी की कोई जात नही होती।।

लौट आते है लोग खाली हाथ अमीरों दे दरवाज़ों से,
किसी फ़क़ीर की दुआ लेना, उनकी कही खाली कोई बात नही होती ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

14 comments:

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...