Saturday, 4 May 2019

"खिलाफ" (KHILAAF)


वार आँखों के दिल पर चले,
समझो इरादा उनका साफ है।।

मासूमियत इतनी थी खुदा के,
उनका तो हर एक गुनाह माफ है।।

चहरे की लालिमा तो मानो,
शाम की ललाट लिये आफ़ताब है।।

नूर-ए-हुस्न की दौलत लिए है,
तभी चहरे पर उनके हिज़ाब है।।

ख़्वाईश रखते भी कैसे पाने की,
खुली आँखों से देखा हुआ ख़्वाब है।।

बहुत राज़ लिए बैठी है आंखे,
मानो कोई तिलस्मी किताब है।।

बैठ कर पहरों बातें भी कर लूं,
तेरा अक्ष लिए जैसे कोई महताब है।।

कहाँ हवाएँ हक में होंगी "चौहान",
जब ये फ़िज़ा तक ख़िलाफ़ है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

6 comments:

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...