Tuesday, 28 May 2019

"काश" (KAASH)


काश जलाने का नहीं, यहाँ भी दफनाने का रिवाज होता,
जब भी तेरी याद आती ,तेरी क़ब्र पर मिलने चला आता।।

छोड़ देता ये रीति रिवाज़, इस समाज के झूठे नातों के,
तेरी कब्र की मिट्टी उठा मैं भी अपने माथे से लगा लेता।।

बैठ कर मैं भी कर लेता बातें तुझसे,क़िस्से अपनी यारी के,
फूल चढ़ाने के बहाने ,तुझसे रोज़ मुलाकातें ही कर लेता।।

जो आज टूट के बिखर गए है मोतियों से रिश्ते सभी,
पल भर को सही , सबको अपने दामन में भर लेता।।

यकीन था दोस्ती पर,मेरी एक बार आज़माइश तो करता,
तेरी ख़ातिर "चौहान" दुनिया क्या,भगवान से भी लड़ लेता।।

बहाने आज मैं खुद को बहलाने के लिए, खुद से ना बनाता,
आज भी दिल कहता है तु होता ,तो मेरी आवाज़ सुन चला आता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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